Airlift Film Review - अक्षय की एयरलिफ्ट से दर्शकों को मिला साल का पहला तोहफा

AirLift

Shantanu Majumdar:-

बहुत समय के अंतराल के बाद किसी फिल्म के रीव्यू के साथ आप सब से रुबरु हो रहा हूँ। और यकीन मानिए फिल्म भी क्या खास चुनी है मैनें वापसी के लिए। तो आइए जानते हैं कि कैसी है ये मानव इतिहास में हुए अब तक के सबसे बड़े इवेक्युएशन प्लान पर आधारित ‘’एयरलिफ्ट’’...


कहानी

2 अगस्त सन् 1990 को इराक के तानाशाह शासक सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर अपने सैनिकों द्वारा जबरन हमला कर दिया। उन इराकी सैनिकों ने कुवैत में बसे हजारों लोगों की नृशंस हत्या कर दी। उस हमले में लगभग 1,70,000 भारतीय भी फंस गए थे। एयरलिफ्ट उन्हीं भारतीयों के कुवैत से निकाले जाने की कहानी है।

रंजीत कटियाल (अक्षय कुमार) भी उन भारतीयों में से एक है। हालाकि रंजीत खुद बहुत पैसेवाला है। और वो चाहे तो खुद अपने परिवार को लेकर कभी भी कुवैत छोड़ सकता है। लेकिन इन सभी संभावनाओं को नज़रअंदाज करते हुए वो वहां रुकता है और कभी अपनी ताकत से, कभी उंचे लोगों तक अपनी पहुंच की मदद से बाकी देशवासियों को उस खाड़ी देश से निकालने की हरसंभव कोशिश करता है।


पटकथा, निर्देशन और अन्य


फिल्म की कहानी, पटकथा और निर्देशन, तीनों ही विभागों का काम राजा कृष्णा मेनन ने किया है।

कहानी बेशक असल ज़िंदगी में घटित घटना पर आधारित है। लेकिन ये भी एक सच है कि आज की पीढ़ी के कई लोगों को एयर इंडिया और रंजीत कटियाल के इस अदम्य और प्रशंसनिय काम की जानकारी तक नहीं है। ऐसी स्थिती में मेनन साहब को इस कहानी को दुबारा ज़िंदा करने और एक शानदार फिल्म के ज़रिए लोगों तक लाने तक के लिए ढेर सारी बधाईयां। हालाकि कहानी में मेनन का साथ सुरेश नायर, राहुल नांगिया और रीतेश शाह ने भी दिया है।

कहानी की ही तरह राजा मेनन का निर्देशन भी उम्दा है। कहना पड़ेगा कि उन्होंने फिल्म को बिल्कुल वैसे ही ट्रीट किया है जैसे कि कहानी की मांग थी, यानी कि असल कहानी का रीयलिस्टक एप्रोच।

एयरलिफ्ट की एडिटिंग का काम हेमन्ती सरकार ने किया है और फिल्म की लेंथ को मात्र दो घंटे पांच मिनट रखकर एडिटर ने काफी अच्छा काम किया है। यहां ये बात भी हमारे रीडर्स को जानने की ज़रुरत है कि क्योंकि फिल्म का टेस्ट ज़रा ऑफबीट है जिस कारण इसकी रफ्तार थोड़ी धीमी है। ऐसी स्थिती में फिल्म की लंबाई को छोटा करना वाकई एक अच्छी सोच का नतीजा है।

सिनेमैटॉग्रेफी का काम प्रिया सेठी का है और उनका भी काम सराहनीय है।

फिल्म का संगीत अमान मलिक और अंकित तिवारी ने दिया है। बेशक कोई भी गाना चार्टबस्टर तो नहीं है, लेकिन फिर भी सोच न सके और दिल तुझे दे दी अच्छे और गुनगुनाने योग्य हैं।


अभिनय


रंजीत कटियाल की भूमिका में खिलाड़ी कुमार न सिर्फ जमे हैं बल्कि उन्होंने इस किरदार को बड़ी ही इमानदारी से निभाया है। वैसे भी मैंने पिछले तीन-चार सालों में ये नोटिस किया है कि अक्की हर साल एक न एक ऐसी दमदार कहानी वाली फिल्म ज़रूर करते हैं और उसमें निभाए अपने किरदार से सभी का दिल जीत लेते हैं। पहले स्पेशल 26, फिर बेबी और अब एयरलिफ्ट भी उसी लीग में अगला नाम है।

अमृता कटियाल यानि की अक्षय की बीवी की भूमिका में निम्रत कौर का भी ज़िक्र करना ज़रूरी है। फिल्म देखते वक्त आपको इस बात का आसानी से अंदाज़ा लग जाएगा कि अक्षय के मुकाबले निम्रत का किरदार ज़रा कमज़ोर सा है। लेकिन इसके बावजूद भी अपने उतकृष्ट अभिनय के दम पर वो सभी कलाकारों के बीच में अपनी जगह बनाने में सफल रही हैं।

साथ ही संजीव कोहली के किरदार में कुमुद मिश्रा और जॉर्ज कुट्टी के किरदार में प्रकाश बेलावड़ी का काम भी सराहनीय है। प्रकाश बेलावड़ी के अभिनय की बात यहां अलग से करने की ज़रुरत इसलिए भी है क्योंकि उनका जॉर्ज जैसे चिड़चिड़े और से ल्फ सेंटर्ड वाला किरदार न सिर्फ बीच बीच में दर्शकों को चुटीलेपन का डोस देता रहता है बल्कि आगे चलकर अपने अड़ियल स्वभाव से दर्शकों के मन में वो ज़रूरी खीझ भी पैदा करने में कामयाब रहा है।

इन सबके अलावा फिल्म में पूरब कोहली, फरीना वज़ीर, सुरेंद्र पाल, अवतार गिल समेत बाकी सभी कलाकारों का काम बढ़िया है।


वर्डिक्य – 3.75/5

कॉमेंट – साल का ये पहला महीना है और एयरलिफ्ट जैसी फिल्म से ज्यादा अच्छी शुरुआत बॉलीवुड के लिए और क्या हो सकती है। गणतंत्र दिवस नज़दीक है, जाइए फिल्म देखिए और साक्षी बनिए भारतीयों के इस अद्भुत अभियान का।

जय हिन्द, जय भारत।

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