नीरजा फिल्म समीक्षा: नीरजा की आम से खास बनने की कहानी

Neerja Review

‘आनंद’ का वो डायलॉग तो आप को याद ही होगा...बाबू मोशाय, ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं। इस फिल्म का, या यूं कहें कि नीरजा भनोट का भी यही फलसफा था। भला कौन जानता था कि राजेश खन्ना की ये फैन एक दिन इस देश के लिए कुछ ऐसा कर जाएगी कि लाडो के हीरो की ये फिल्मी लाईन उसी के जीवन को चरितार्थ कर जाएगी। चलिए जानते हैं कुछ अपनी फिल्म नीरजा के बारे में...

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कहानी

नीरजा एक 22 की लड़की है, जो पैन अमेरिका फ्लाइट सर्विस में हेड पर्सर है। उसके कुछ सपने हैं, बड़े अरमान हैं। उसके जीवन में परेशानियां हैं, वो उनसे लड़ती है, जीतती है और फिर आगे बढ़ जाती है। एक सुबह जब उसकी फ्लाइट कराची पहुंचती है तो कुछ आतंकी उस फ्लाइट को हाइजैक कर लेते हैं। अपनी शर्तें मनवाने के लिए वो फ्लाइट में सवार लोगों को बंधक बनाते हैं और कुछ लोगों को मार भी देते हैं। इतने जटिल परिस्थितियों में किस तरह नीरजा अपने सूझ-बूझ से उनका सामना करती है और फिर अपनी शहादत से आतंकवाद जैसी घिनौनी बीमारी को मुंहतोड़ जवाब देती है.....यही है फिल्म के आगे की कहानी।

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पटकथा, निर्देशन और अन्य


कहानी तो बेशक सच्ची घटना पर आधारित है। लेकिन एक सच ये भी है कि एक नौजवान लड़की की ये अदम्य कहानी आज की पीढ़ी में शायद ही किसी को ठीक से पता हो। इस स्थिती में एक शुक्रिया तो उन सभी लोगो को बनता है जिनकी वजह से ये कहानी सबके सामने आ सकी, नीरजा एक बार फिर हम सबके दिलो में ज़िंदा हो सकी। विशेषकर कहानीकार साइविन क्वादरस और संयुक्ता चावला सबसे ज्यादा बधाई के पात्र हैं।

राम माधवानी की निर्देशक के रूप में ये दूसरी फिल्म है। हालाकि वो इस इंडस्ट्री के मशहूर एड फिल्म मेकर हैं। लेकिन 30 सेकंड्स के फार्मेट से दो घंटे तक का सफर तय करना ज़रा मुश्किल होता है और ये मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब जिम्मेदारी किसी रीयल लाइफ हीरो की कहानी को बयां करने की हो। लेकिन खुशी की बात ये है कि अपने इस प्रयास में वो चूके नहीं और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है। दरअसल उनके स्क्रीनप्ले को बयां करने के अंदाज़ ने ही इस फिल्म में अनूठापन का एक अलग फ्लेवर एड किया है। फिल्म में वर्तमान में हो रही परिस्थितियों को फ्लैशबैक से कनेक्ट करना और फिर वहीं से उनके जवाब ढूंढने का ये अंदाज़ वाकई इस फिल्म की जान है।

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मै मानता हूं कि कहानी और निर्देशन के अलावा अगर फिल्म को अंतिम रूप कहीं और भी दिया जाता है तो वो विभाग है एडिटिंग टेबल। नीरजा की एक ताकत ये भी है कि इस फिल्म को मोनीशा बलडावा ने मात्र दो घंटे का ही रखा है। इस वजह से फिल्म बड़ी तेज़ गति से आगे बढ़ती है। हालाकि सेकेंड हाफ में कुछ देर के लिए फिल्म ड्रैग ज़रूर करती है, लेकिन उसकी कसर फिल्म अपने रोचक प्री-क्लाइमैक्स सीक्वंस में पूरी कर देता है।

फिल्म में म्यूज़िक न्यूकमर विशाल खुराना का है। म्यूज़िक की बात यहां नहीं करनी चाहिए। दरअसल ऐसी फिल्मे गीत संगीत के बिना भी अच्छी लगती हैं। लेकिन फिर भी ‘जीते हैं चल’ वाला ट्रैक बढ़िया है।

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अभिनय

फिल्म की हीरो सोनम कपूर हैं यानि ज़ाहिर तौर पर नीरजा का पूरा भार उनके कंधे पर ही है। अब ये बात तो किसी से छुपी नहीं है कि सोनम की अभिनय क्षमता किस स्तर की है। जो कुछ हिट फिल्में उनकी झोली में आयी भी हैं उनमें सोनम का योगदान कितना है, इस विषय पर चर्चा करना ही बेमानी होगी।

सच है, लेकिन ज़रा रुकिए...किसी को भी कम आंकना दरअसल हमेशा एक भूल ही होती है। सोनम के लिए भी यही बात सच साबित होता है। कहना पड़ेगा कि नीरजा ने उनके अभिनय कौशल की मानो कायापलट ही कर दी।

ऐसी चैलेंजिंग फिल्म का चुनाव करके तो उनका एक प्रशंसनिय कार्य़ किया ही है, साथ ही इस किरदार में जान फूंक कर उन्होने अपने सभी समाचोलकों ( मेरा भी) का मुंह बंद कर दिया है।

नीरजा की मां के किरदार में शबाना आज़मी का काम भी बेजोड़ है। हालात से बेबस, फिर भी खुद को और अपने परिवार को ढांढस बंधाते हुए किरदार में आप एक मां की करुणा को साफ साफ महसूस कर सकते हैं।

योगेंद्र टीकू, लाडो के पिता के किरदार में काफी जमे हैं। धीरे धीरे ही सही पर योगेंद्र बॉलीवुड के एक सशक्त चरित्र अभिनेता के रूप में उभर रहे हैं।

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वर्डिक्ट – 4.25/5

कॉमेंट – साल की शुरुआत में एयरलिफ्ट और अब नीरजा। ये इंडस्ट्री बायोपिक कथानक के मामले में सही दिशा में जा रही है। जहां एयरलिफ्ट एक अप्रवासि भारतीय के सूझ-बूझ की कहानी थी, तो वहीं नीरजा एक जवान लड़की के साहस भरे कारनामे की वजह से आम से बहुत खास बनने की कहानी है। मैं तो कहता हूं कि नीरजा कुछ मामलों में एयरलिफ्ट से भी अच्छी फिल्म है।

जाइए और ज़रूर देखिए नीरजा....बायोपिक की कड़ीयों में शायद अब तक की सर्वश्रेष्ठ एंट्री।

·       शांतनु मजुमदार
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