फैन फिल्म रीव्यू: दमदार स्टोरीलाईन का बेदम एक्सेक्यूशन

फैन फिल्म रीव्यू: दमदार स्टोरीलाईन का बेदम एक्सेक्यूशन



फिल्म – फैन

निर्देशक – मनीष शर्मा

स्टारिंग – शाहरुख खान, वलूशा डिसूज़ा, श्रिया पिलगांवकर, सयानी गुप्ता, योगन्द्र टीकू व अन्य

आज फैन देखी....

शाहरुख बिना किसी शक के बॉलीवुड इंडस्ट्री के सुपरस्टार हैं। लेकिन अपने फैंस के लिए वो उससे बढ़कर भी बहुत कुछ है। कईयों के लिए वो सिर्फ स्टार नहीं, दुनिया हैं उनकी और इन कइयों को ही कहते हैं ‘फैन’। एक आर्टिस्ट को स्टार बनाते हैं ये फैन, उन्हें सफलता के शिखर पर पहुंचाते हैं ये फैन, बाकियों की भीड़ से उन्हें अलग करते हैं ये फैन। लेकिन एक फैन की अपने स्टार के लिए दीवानगी किस हद तक सही है, क्या ये एक सवाल नहीं है?

उत्सुकता तब और बढ़ जाती है जब पता लगता है कि इस सवाल का मूल आधार ही है ये फिल्म फैन। वो फिल्म जिसमें शाहरुख खुद शाहरुख के फैन के किरदार में नज़र आ रहे हैं। बेशक एकबारगी सुन के ही स्क्रिप्ट काफी रोचक लगती है। तो फिर ज़रा सोचिए कि फिल्म का एक्ज़ेक्यूशन कैसा होगा! तो चलिए जानते हैं इस फिल्म के बारे में...


कहानी

गौरव चांदना (शाहरुख खान) दिल्ली में रहने वाला एक 20-25 साल का लड़का है, जो सुपरस्टार आर्यन खन्ना (शाहरुख) का बहुत बड़ा फैन है। आर्यन औऱ गौरव में सुपरस्टार होने के अलावा एक और समानता है। वो है उन दोनो की शक्लों का आपस में मिलना, या यों कहें कि गौरव, आर्यन खन्ना की लगभग कार्बन कॉपी ही है।

बहरहाल गौरव अपने फेवरेट स्टार का जन्मदिन मनाने और उनसे मिलने के लिए मुबंई जाता है। लेकिन ऐसा मुमकिन हो नहीं पाता है। इसके उलट अपने स्टार आर्यन को खुश करने के चक्कर में गौरव कुछ ऐसा कर बैठता है जो कि न तो कानून की नज़र में और न ही खुद आर्यन की नज़र में सही है। आर्यन खुद गौरव को हवालात में बंद करवाता है, उसे फटकार लगाता है और वापिस दिल्ली भेज देता है।

बस यहीं से गौरव का आर्यन के लिए दीवानापन, कभी खत्म न होने वाले नफरत में बदल जाता है। और गौरव हर वो काम करता है जिससे कि आर्यन का नाम और कैरियर दोनो खत्म हो सके। आगे कि कहानी गौरव के इसी नफरत की दास्तां को बयां करती है।


पटकथा, निर्देशक व अन्य

जैसा की मैं पहले ही लिख चुका हूं कि फिल्म का नैरेशन वाकई काफी रोचक है। लेकिन मामला दरअसल ये है कि एक रोचक स्क्रिप्ट के बावजूद भी फिल्म में इंटेंसिटी मिसिंग है। और इस कमी के लिए अगर कोई मुख्य रूप से ज़िम्मेदार है तो वो है फैन की पटकथा। किसी भी इंटरेस्टिंग स्टोरी को पर्दे पर उतारने का काम पटकथा लेखक का होता है लेकिन फैन के मामले में ऐसा नहीं हो पाया।

फिल्म के स्क्रीनप्ले में ऐसे कई लूपहोल्स और बेवजह के सीन्स हैं जिनका कोई लॉजिक नहीं बैठता। कहानी और पटकथा दोनो ही मनीष शर्मा ने लिखी है। अफसोस की कहानी के रंगरूप के माफिक वो फिल्म की पटकथा को नहीं बांध सके। शायद इसी लिए फैन फर्स्ट हाफ में ही अपना ग्रिप छोड़ देती है।

कहानी और पटकथा के साथ ही फिल्म का निर्देशन भी मनीष शर्मा ने ही किया है। डायरेक्शन के नाम पर शर्मा जी के पास बैंड बाजा बारात और शुद्ध देसी रोमांस जैसी हिट फिल्में हैं, लेकिन फैन उन सबसे बड़ा वेन्चर है। लेकिन यहां भी फलसफा कुछ कुछ स्क्रीनप्ले जैसी ही है। कुल मिलाकर कहा जाए तो डायरेक्शन फीका है और फिल्म को बेहतर बनाने में कुछ खास नहीं करता।

पटकथा और निर्देशन के साथ ही फैन की एडिटिंग में भी थोड़ा बहुत झोल है। एडिटिंग का काम जैक गोवर और नम्रता राव ने किया है। मसलन इसकी लेंथ की ही बात करें तो ये 144 मिनट यानि की लगभग 2.30 घंटे की है। जबकि फिल्म देखने पर कोई भी ये कहेगा कि इसकी लेंथ को बिना किसी दिक्कत के 20 मिनट तक छोटा किया जा सकता था। कुछ सीन्स और एक चेज़िंग सीक्वंस फिल्म में बेमानी और खींचे हुए से लगते हैं।

फिल्म में संगीत विशाल शेखर का है और इसका एकमात्र गाना या कहें कि फैन-एंथम “जबरा फैन” सुपर-डुपर हिट साँग है। हिंदी के साथ ही इसे बंग्ला और भोजपूरी समेत 6 अलग-अलग भाषाओं में लिखा और गाया गया है।


अभिनय

मुझे ये कहने में बिल्कुल भी झिझक नहीं हो रही है कि फैन का सेविंग ग्रेस इसका अभिनय विभाग ही है।

गौरव चांदना जैसे ऑबसेसिव, डायहार्ड और सनकी फैन के किरदार में शाहरुख खूब जमे हैं औऱ काफी समय के बाद उनका अभिनय दुबारा दर्शकों के दिलों में छाप छोड़ता है। वहीं दूसरी तरफ आर्यन खन्ना के किरदार में भी शाहरुख अपने फिल्मी स्टारडम और ऐटिट्यूड को पर्दे पर बखूबी पोट्रे करते हैं। लेकिन फिर भी गौरव की अदाकारी आर्यन पर भारी रही है।

गौरव के मां-बाप के किरदार में क्रमश: दीपीका अमीन और योगेंद्र टीकू का काम भी बहुत अच्छा है।

इनके अलावा श्रिया पिलगांवकर, वलूशा डी सूज़ा, सयानी गुप्ता और बाकी कलाकारों ने भी अपना अपना किरदार शिद्दत से जीया है।


वर्डिक्ट – 2.5/5

कॉमेंट - हालाकि यहां ये बताना भी ज़रूरी है कि फिल्म किसी भी दृष्टिकोण से बूरी नहीं है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि जितनी अच्छी इसकी स्टोरीलाइन साउंड करती है, उतनी पर्दे पर उतरकर आती नहीं है। लेकिन फिर भी पिछले 4-5 सालो में आई शाहरुख की किसी भी फिल्म से फैन निश्चित तौर पर बेहतर फिल्म है और एक बार देखने लायक भी।


·       शांतनु मजुमदार

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